
गलती निकालते निकालते जिंदगी बीत गई, पता ही नहीं चला के किसकी थी।
काश! के जी ली होती थोड़ी तसल्ली से, सोचकर जो हुआ, खुदा ने किया।
गुफ्तगू की जरूरत ही ना थी, खुदा का दिया प्यार, जो झोली में कबूल करते,
गलतियों को चुनते-चुनते, प्यार जमी पर बिखेर दिया हमने ।
क्या हुआ, किसने किया, की सज़ा देते-देते, भूल गए कि माफीनामा तो,
ऊपर दरगाह में है, काफिर का चला!
अपनों से साजिशें, दोस्ती अल्लाह से कैसे कर ली तुमने?
तेल गिराकर तुमने कैसे बंदगी कर ली? सवेरा जागने से है बचपन में सिखाया,
बढ़ती उम्र ने तो सबको सोता पाया ।
Writer :- Maninder Kaur
Published by : Ranjandeep Sandhu 8847456147

